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: वनों को हरा भरा रखते हुए आजीविका का माध्यम बनाने के श्री कांडपाल के प्रयासों को, पूरे राज्य में आखिर क्यों लागू किया जाएगा, देखें खबर

admin

Sun, Nov 3, 2024

■■ विलुप्त हो रहे कल्पवृक्ष "च्यूरा" को नई पहचान दे गए ■■ श्री कांडपाल■■

चंपावत। (गणेश दत्त पांडे ) बनों को हरा भरा रखते हुए इसे आजीविका का माध्यम बनाने के लिए दो रोज पूर्व रिटायर हुए डीएफओ आरसी कांडपाल के प्रयासों को वन विभाग में इसे पूरे उत्तराखंड के लिए मॉडल मानते हुए अन्य प्रभागों में भी लागू करने के निर्णय से ग्रामीणों के लिए रोजगार के नए द्वार खुलेंगे। श्री कांडपाल द्वारा मुख्य राजमार्ग में च्यूरानी स्थान में प्रकृति द्वारा मानव को दिए गए उपहार में से एक "च्यूरे" को नई पहचान देने के साथ आज की पीढ़ी से उसका परिचय कराया है। इसके लिए यहां उन्होंने च्यूरा उत्कृष्टता केंद्र स्थापित कर उसे म्यूजियम का रूप दिया है। यहां च्यूरे का पौधालय बनाने के साथ मशीन भी लगाई गई है जहां च्यूरे के बीजों से तेल एवं अन्य प्रोडक्ट निकाले जा रहे हैं। च्यूरा प्रकृति की ऐसी देन है जो केवल जाड़ों में उस समय खिलता है जब अन्य सभी वनस्पति सिकुड़ जाती है। यह मौन पालको के लिए तो बैहद फायदेमंद है। श्री कांडपाल द्वारा शुरूआती तौर पर यहां की आधा दर्जन ग्राम पंचायतों के 137 परिवारों को मौन पालन के लिए प्रेरित करने का ट्रायल पहले प्रयासों में सफल रहा।


उन्होंने यहां 60 हेक्टेयर में 60 हजार तेजपात के पौधे लगाए हैं। जो आने वाले पांच वर्षों में वन पंचायतों की मजबूत अर्थव्यवस्था का आधार बनेंगे। च्यूरे को केंद्र बिंदु बनाकर इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ रहे काली कुमाऊं के रेंजर राजेश जोशी अपनी रेंज को मॉडल रूप देने के प्रयास में लगे हैं। च्यूरे के इस मांडल को पिछले दिनों आए प्रशिक्षु वन दरोगाओं को भी दिखाया गया।

■■■ क्यों कहते हैं च्यूरे को कल्पवृक्ष■■■

चंपावत। च्यूरे से ऐसा वनस्पति तेल निकलता है जिसमें पकवान बनाने पर उसका स्वाद कभी नहीं भूला जा सकता है। यह हृदय व डायबिटीज़ के रोगियों के लिए तो संजिवनी से कम नहीं है। इसके तेल का दीया भगवान को सबसे प्रिय हैं उसमें कार्बन नहीं लगता। इस तेल को नाभि में मलने से पूरे शरीर की शुष्कता समाप्त होकर शरीर चमकने लगता है। चेहरे पर इसका तेल लगाने पर जहां महंगे कॉस्मेटिक को फेल कर देता है इससे बने साबुन का प्रयोग करने पर पूरी त्वचा चमकने लगती है। च्यूरे का जैविक शहद कई रोगों की एक दवा है। च्यूरे की पत्तियां पशुओं का पोष्टिक आहार होती है।

■■■ जायका परियोजना के सलाहकार बनाए गए श्री कांडपाल■■■

चंपावत। बहुआयामी व्यक्ति के लिए तो चौतरफा द्वार खुले रहते हैं। डीएफओ के रूप में उनके द्वारा किए गए तमाम कार्यों को देखते हुए रिटायर होने के बाद राज्य सरकार द्वारा उन्हें जायका परियोजना के सलाहकार की महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। अब वह इस परियोजना के जरिए चंपावत वन प्रभाग में शुरू किए गए कार्यों को और आगे बढ़ाने के साथ पूरे राज्य में संचालित करने का प्रयास करेंगे।

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