“जब अपने ही बिछड़ते हैं तो खाली हो जाता है दफ्तर… पालिका कर्मियों की : विदाई में छलक पड़े जज़्बात”
Abid Hussain
Tue, Mar 31, 2026
“जब अपने ही बिछड़ते हैं तो खाली हो जाता है दफ्तर… पालिका कर्मियों की विदाई में छलक पड़े जज़्बात”
लक्ष्मण सिंह बोहरा और लिपिक अर्जुन सिंह को भावभीनी विदाई, नम आंखों के बीच गूंजा—‘आप दिलों से कभी रिटायर नहीं होंगे’
टनकपुर/चंपावत।नगर पालिका परिसर उस समय भावनाओं के सैलाब में डूब गया, जब वर्षों तक अपनी सेवा, ईमानदारी और आत्मीयता से सभी के दिलों में जगह बनाने वाले पालिका कर्मी लक्ष्मण सिंह बोहरा (JE) और लिपिक अर्जुन सिंह को सम्मानपूर्वक विदाई दी गई। यह सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि हर उस दिल की आवाज थी जो इन दोनों के जाने से खालीपन महसूस कर रहा था।
समारोह की शुरुआत जैसे ही हुई, माहौल धीरे-धीरे भावुक होता चला गया। मंच से जब उनके योगदान और व्यक्तित्व का जिक्र हुआ, तो कई आंखें नम हो गईं। सहकर्मियों ने कहा कि “रिटायरमेंट सिर्फ एक पद से होता है, रिश्तों और यादों से नहीं।”
लक्ष्मण सिंह बोहरा ने अपने लंबे सेवाकाल में जो ईमानदारी, अनुशासन और समर्पण दिखाया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बन चुका है। वहीं अर्जुन सिंह को सभी ने अपने बड़े भाई के रूप में याद किया—एक ऐसा साथी, जो हर मुश्किल में सबसे पहले साथ खड़ा मिलता था।
कार्यक्रम के दौरान कई वक्ताओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि दफ्तर में अब वह अपनापन, वह हंसी और वह सहजता पहले जैसी नहीं रह पाएगी। “जब रोज़ साथ बैठने वाले चेहरे अचानक सामने न दिखें, तो एहसास होता है कि कोई अपना दूर चला गया है,”—यह बात सुनकर पूरा माहौल भावुक हो उठा।
विदाई के इस अवसर पर पंजीकृत ठेकेदार उमाशंकर, टीकाराम खर्कवाल, कैलाश गड़कोटी, सोमनाथ सिंह, विनोद शारदा, प्रदीप पांडे, दीपक मेहर सहित पालिका कर्मी मनोहर सिंह, हेमंत टंडन, विशाल प्रकाश सिंह, अनुराधा यादव, अंकित अग्रवाल, सभासद सभ्भ्या वाल्मीकि, विनोद सिंह, शैलेंद्र सिंह आदि सभासद मौजूद रहे।
कार्यक्रम में अधिशासी अधिकारी ऋषभ उनियाल और पालिका अध्यक्ष विपिन कुमार ने भी दोनों कर्मचारियों के योगदान की सराहना करते हुए उन्हें स्मृति चिन्ह भेंट किए।
अंत में सभी ने एक स्वर में कहा—
“आप दोनों भले ही आज से कार्यालय में नजर नहीं आएंगे, लेकिन हमारे दिलों और यादों में हमेशा जीवित रहेंगे।”
यह विदाई समारोह एक बार फिर यह एहसास दिला गया कि सरकारी दफ्तर सिर्फ काम करने की जगह नहीं होते, बल्कि एक परिवार होते हैं—जहां किसी एक के जाने से सच में एक खालीपन हमेशा के लिए रह जाता है।
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