●●● चंद राजाओं के दौर में राजस्थान से आए कारीगर, आज 600 परिवारों तक फैला इतिहास—बचाने की चुनौती बनी विरासत और बोली
विशेष रिपोर्ट■आबिद सिद्दीकी (संपादक)
टनकपुर/चम्पावत। पहाड़ों की शांत वादियों में बसा खूना मलक गांव अपने भीतर एक अनोखा और कम ज्ञात इतिहास समेटे हुए है। जिला मुख्यालय चंपावत से लगभग 12 किलोमीटर दूर लोहाघाट मार्ग पर स्थित यह गांव उत्तराखंड का ऐसा पहाड़ी मुस्लिम बहुल क्षेत्र है, जहां मनिहार समुदाय की सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित है।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि कुमाऊं के चंद राजवंश के शासनकाल में इस गांव की स्थापना हुई। बताया जाता है कि उस समय चंद राजाओं की रानियों को चूड़ियां पहनने का अत्यधिक शौक था। उनकी इस इच्छा को पूरा करने के लिए राजस्थान से मनिहार (चूड़ी बनाने वाले कारीगर) समुदाय के कुशल लोगों को यहां बुलाकर बसाया गया। यही कारीगर रानियों के लिए प्रतिदिन नई चूड़ियां बनाते और पहनाते थे।
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, रानियां सुबह नई चूड़ियां पहनती थीं और शाम को उन्हें तोड़ देती थीं। इस परंपरा के चलते मनिहारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई थी। यही कारण है कि उस दौर में यहां बसाए गए कुछ परिवार आज बढ़कर लगभग 600 परिवारों के बड़े समुदाय में बदल चुके हैं, जो वर्तमान में टनकपुर क्षेत्र के मनिहार गोठ सहित आसपास के इलाकों में निवास करते हैं।
मनिहार शब्द का अर्थ ही होता है—चूड़ी बनाने वाला। इस समुदाय के इतिहास को लेकर दो प्रमुख मान्यताएं प्रचलित हैं। पहली मान्यता के अनुसार, लगभग 700 ईस्वी में चंद शासन की शुरुआत के साथ ही मनिहार परिवार यहां लाए गए थे। दूसरी मान्यता के अनुसार, वर्ष 1638 में मुगल बादशाह शाहजहां के समय बाज बहादुर चंद कुछ मनिहारों को रामपुर से चम्पावत लेकर आए थे। हालांकि, स्थानीय लोगों के बीच पहली मान्यता को अधिक प्रामाणिक माना जाता है, जिसके समर्थन में पुराने दस्तावेज और राजस्व अभिलेख भी उपलब्ध हैं।
इतिहास की गवाही आज भी गांव में मौजूद पुरानी मस्जिद देती है, जो अब खंडहर में तब्दील हो चुकी है। इसके बाद निर्मित नई मस्जिद लगभग 350 से 400 वर्ष पुरानी मानी जाती है, जहां आज भी लोग नमाज अदा करते हैं। पुराने राजस्व अभिलेखों (खतौनी) में 1200 और 1300 फसली वर्ष का उल्लेख भी इस समुदाय की प्राचीन उपस्थिति को प्रमाणित करता है।
मनिहार समुदाय की सांस्कृतिक पहचान भी बेहद खास है। इनकी अपनी एक अलग बोली है, जिसमें उर्दू, नेपाली, कुमाऊनी और हिंदी का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है। यह बोली न केवल उनकी पहचान है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक धरोहर भी है। हालांकि, बदलते समय के साथ यह बोली अब विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही है।
इस विरासत को बचाने के लिए स्थानीय शिक्षक जहीर अब्बास लगातार प्रयासरत हैं। वे समय-समय पर लोगों को जागरूक करते हैं और आधुनिक माध्यमों जैसे व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए इस बोली के संरक्षण का प्रयास कर रहे हैं।
आज यह समुदाय अपनी सादगी, मेहनतकश जीवनशैली और उत्तराखंडी संस्कृति में पूरी तरह रचा-बसा हुआ है। पारंपरिक वेशभूषा और सामाजिक मूल्यों के साथ यह लोग पहाड़ की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बना रहे हैं।
खूना मलक केवल एक गांव नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और सांस्कृतिक समन्वय का जीवंत उदाहरण है—जिसे सहेजना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना बेहद जरूरी है। वर्तमान में लतीफ हुसैन, सखावत हुसैन, मोहम्मद हनीफ, मोहम्मद अहसान के परिवार यहां निवास कर रह रहे हैं। गांव के अन्य लोग टनकपुर के ग्राम पंचायत मनिहार गोठ में अपना जीवन यापन कर रहे हैं।
■■ शिक्षक जहीर अब्बास ने कहा,
“हमारी यह बोली और परंपरा हमारी पहचान है। अगर अभी इसे नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से कट जाएंगी। मेरा प्रयास है कि लोग अपनी भाषा और इतिहास पर गर्व करें और इसे आगे बढ़ाएं।”
■■ गांव के बुजुर्ग लतीफ हुसैन का कहना है,“हमारे पूर्वजों को चंद राजाओं के समय यहां बसाया गया था। उस दौर में रानियों को रोज नई चूड़ियां पहनाई जाती थीं। हम लोग पीढ़ी दर पीढ़ी यही काम करते आए हैं, यही हमारी पहचान है।”
■■ युवा साथी सलमान का कहना है,“हमारी पहचान हमारी बोली और इतिहास से है। हम नई पीढ़ी के लोग इसे आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए जागरूकता और सहयोग बहुत जरूरी है।”
■■ स्थानीय लोगों ने बताया, कि“गांव में नमाज केवल शुक्रवार के दिन हाफिज गुलाम रसूल के द्वारा ही अदा कराई जाती है। उस दिन सभी लोग एकत्र होकर जुमे की नमाज पढ़ते हैं, जो हमारी परंपरा और एकता का प्रतीक है।”
■■ फरियाद हुसैन का कहना है,“हमारे पूर्वजों की यह विरासत हमारे लिए गर्व की बात है। हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी भी अपने इतिहास और परंपरा को समझे और इसे आगे बढ़ाए।”
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शफीकुर रहमान (पूर्व सदर) ने कहा,“खूना मलक का इतिहास हमारी पहचान है। मनिहार समाज की यह विरासत सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर है। इसे सहेजना हम सभी की जिम्मेदारी है।”